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संज्ञा - विकार : कारक | Declension of noun : Case

          संज्ञा - विकार : कारक | Declension of noun : Case


परिभाषा - किसी वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा सर्वनाम पदों का उस वाक्य क्रिया से जो सम्बन्ध होता है , उसे 'कारक' हैं।














उदहारण -
(क) राम ने सीता से विवाह किया।        (ख)   लंका सोने की थी।
 
कारक  और उसके परसर्ग
कारक                    परसर्ग
कर्त्ता                       ने (परसर्ग रहित भी )
कर्म                        को, से, ( परसर्ग  रहित भी )
करण                      से, द्वारा के द्वारा
संप्रदान                   को , के लिए
अपादान                  से
अधिकरण                में , पर
संबंध                      'का', 'के', 'की', 'ना', 'ने', 'नी' तथा 'रा', 'रे', 'री',
संबोधन                   'हे', 'हो', 'अरे', 'अजी' आदि।

कारक के भेद- कारक के छः  भेद है।
(1) कर्त्ता
(2) कर्म
(3) करण
(4) सम्प्रदान
(5) अपादान
(6) अधिकरण

1.कर्त्ता  कारक (Nominative Case) - वाक्य में जिस संज्ञा या सर्वनाम पद से क्रिया के करने वाले का बोध होता है ,उसे कर्त्ता करक कहते हैं ; जैसे -
(क)  मोहन केला खाता है।            (ख)   पुलिस ने चोर को पकड़ा।
वाक्य (क) में 'मोहन' खाने का काम करता है , इसीलिए 'मोहन' कर्त्ता कारक है। वाक्य (ख) में 'पुलिस' पकड़ने का कार्य करती है, इसीलिए 'पुलिस' कर्त्ता कारक है , 'ने' कर्त्ता कारक का चिन्ह है।  लेकिन 'ने' का प्रयोग सर्वत्र  नहीं होता, जैसा की वाक्य (क)  में 'ने' का प्रयोग नहीं हुआ हैं।  'ने' का प्रयोग केवल भूतकाल में सकर्मक क्रिया के साथ किया जाता है।

2. कर्म कारक (Objective case) - वाक्य में जिस संज्ञा या सर्वमान पर क्रिया का फल या प्रभाव पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते है ;जैसे-
 "पुलिस ने चोर को पकड़ लिया " में 'पकड़ना' क्रिया का फल या प्रभाव 'चोर' पर पड़ता हैं ,अर्थात चोर पकड़ा जाता हैं। इसलिए 'चोर' कर्म कारक है।  कर्म  कारक का मुख्य चिन्ह 'को' है , लेकिन कुछ वाक्यों में 'से' का प्रयोग होता है ; जैसे - अध्यापक ने रमेश से कहा।  कभी - कभी कोई परसर्ग नहीं लगता ; जैसे - मैं पानी पी रहा हूँ।  यदि वाक्य का कर्म अप्राणिवाचक (निर्जीव) है , तो उसके साथ कर्म कारक का विभक्ति-चिन्ह 'को' प्रायः नहीं लगाया जाता।  जैसे - 'राम ने धनुष तोड़ दिया' न की ' राम ने धनुष को तोड़ दिया।

3. करण कारक (Instrumental Case) - जिसकी सहायता से कोई कार्य संपन्न हो , वह संज्ञा या सर्वनाम पद करण कारक होता है ; जैसे -
(क) मैं कलम से पत्र लिखता हूँ।
(ख) अरविन्द ने चाकू से फल काटा।
(ग) हम चम्मच से खिचड़ी कहते हैं।
उपर्युक्त वाक्यों में 'कलम', 'चाकू', और 'चम्मच' की सहायता से क्रमसः 'लिखने' , 'काटने' और 'खाने'  कार्य किया जा रहा है। इस प्रकार करण ( साधन ) के रूप में होने से 'करण कारक' होता है।  करण कारक में प्रायः 'से' परसर्ग का प्रयोग होता है। कभी - कभी 'से' की वजह 'के द्वारा' अथवा केवल 'द्वारा' प्रयोग होता है ; जैसे - छात्रों  द्वारा कार्यक्रम  संचालन किया गया।

4.  संप्रदान कारक (Dative Case) - जिसके लिए कोई कार्य किया जाए या जिसे कुछ जाए, संज्ञा या सर्वनाम संप्रदान कारक होता है। संप्रदान कारक में 'के लिए' 'को' परसर्ग का प्रयोग होता है ; जैसे - मैं यह पुस्तक रमेश के लिए लाया।
उपर्युक्त वाक्य में 'पुस्तक'  कार्य 'रमेश के लिए' किया गया है।  अतः 'रमेश के लिए' संप्रदान कारक है। "महेश  ने भाई को फल दिया" में 'भाई को'  संप्रदान  कारक है।

5. अपादान कारक (Ablative Case) - जिससे अलग होने का भाव प्रकट हो, उसे अपादान कारक  हैं ; जैसे - (क) पत्ता पेड़ से गिरा।    (ख) गंगा हिमालय से निकलती है।
उपर्युक्त वाक्यों में पत्ता 'पेड़ से' अलग होता है और गंगा 'हिमालय से' इसलिए 'पेड़ से' और 'हिमालय से' अपादान कारक हैं।
'से' परसर्ग का प्रयोग करण कारक और अपादान कारक दोनों से होता है , किन्तु करण में यह साधन होने के और अपादान में अलग होने के भाव को व्यक्त करता है।

6. अधिकरण कारक (Locative Case) - जिन सांग या सर्वनाम पदों से क्रिया के आधार का बोध हो , वे अधिकरण कारक होते हैं ; जैसे -
(क) पुस्तक मेज पर रखी है।   (ख)  मोहन कमरे में है।      (ग)  माता जी घर में है।
उपर्युक्त वाक्यों में 'मेज' , 'कमरा' और 'घर' उनस्थानों का बोध कराते हैं ,जहाँ कोई वास्तु या व्यक्ति स्थित हैं।  अतः 'मेज पर' , 'कमरे में' और 'घर में' अधिकरण कारक हैं।  अधिकरण कारक में 'में' और 'पर' परसर्ग का प्रयोग होता है।
      



  

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