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फणीश्वर नाथ रेणु

                                    फणीश्वर नाथ रेणु

फणीश्वर नाथ रेणु 

जन्म :- 4 मार्च 1921 ,औराही हिंगना (ज़िला पूर्णिया अब अररिया ) बिहार में

प्रमुख रचनाएँ :- मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, जुलूस, कितने चौराहे (उपन्यास); ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धुप (कहानी-संग्रह); ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध, श्रुत-अश्रुत पूर्व (संस्मरण); नेपाली क्रांति कथा (रिपोर्ताज); तथा रेनू रचनावली (पांच खंडो में समग्र)

निधन:- 11 अप्रैल, सन् 1977 पटना में

हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन उतार-चढ़ावों एवं संघर्षों से भरा हुआ था। साहित्य के अलावा विभिन्न राजनैतिक एवं सामाजिक आंदोलन में भी उन्होंने सक्रीय भागीदारी की।  उनकी यह भागीदारी एक ओर देश के निर्माण में सक्रीय रही तो दूसरी ओर रचनात्मक साहित्य को नया  तेवर देने में सहायक रही। 
सन् 1954 में उनका बहुचर्चित आंचलिक उपन्यास मैला आँचल प्रकाशित हुआ जिसमे हिंदी उपन्यास को एक नयी दिशा दी। हिंदी जगत में आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श मैला आँचल से ही प्रारम्भ हुआ।  आंचलिकता की अवधारणा ने कथा-साहित्य में गाँव की भाषा-संस्कृति और वहाँ के लोक जीवन को केंद्र में ला खड़ा किया।  लोकगीत, लोकोक्ति, लोकसंस्कृति, लोकभाषा एवं लोकनायक की इस अवधारणा ने भारी-भरकम चीज़ एवं नायक की जगह अंचल को ही नायक बना डाला. उनकी रचनाओं में ांचन कच्चे और अनपढ़ रूप में ही आता है इसीलिए उनका यह अंचल एक तरफ़ शस्य-श्यामल है तो दूसरी तरफ़ धूल भरा और मैला भी। स्वांतत्र्योत्तर भारत में जब सारा विकास शहर-केंद्रित होता जा रहा था। ऐसे में रेणु ने अपनी रचनाओं से अंचल की समस्यायों की ओर भी लोगों का ध्यान खींचा। उनकी रचनाओं इस अवधारणा को भी पुष्ट करती हैं की भाषा की सार्थकता बोली के साहचर्य में ही है। 

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